मंच पर चढ़ते ही बच्चा सबसे पहले बोलना सीखता है, फिर सुनना, और उसके बाद बाकी सब। बच्चों के लिए थिएटर एक्टिंग वर्कशॉप की यह सूची उन माता पिता के लिए है जो छुट्टियों या वीकेंड में बच्चे को स्क्रीन से हटाकर किसी ठोस काम में लगाना चाहते हैं, बिना यह सोचे कि आगे उसे एक्टर बनना है या नहीं। यहाँ नाटक की कक्षा को हॉबी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, आवाज़ और टीमवर्क की ट्रेनिंग की तरह देखा गया है।
चुनाव में देखा गया कि संस्था कितने साल से काम कर रही है, बच्चों के साथ उसका अनुभव कितना गहरा है, बैच उम्र के हिसाब से बँटे हैं या सबको एक साथ बैठाया जाता है, फैकल्टी में असली रंगकर्मी पढ़ाते हैं या नहीं, और वर्कशॉप के अंत में बच्चे को दर्शकों के सामने खड़ा होने का मौका मिलता है या बात रिहर्सल तक रह जाती है। साथ में भाषा, शहर में लोकेशन, बैच का आकार, फीस की पारदर्शिता और स्कूलों के साथ काम करने का ट्रैक रिकॉर्ड भी गिना गया।
सूची में जगह किसी ने खरीदी नहीं है: क्रम समुदाय के वोटों से बनता है और बदलता रहता है। इसलिए नंबर से ज़्यादा काम की चीज़ हर कार्ड के अंदर है। प्लस और माइनस पढ़ें, अभिभावकों के रिव्यू देखें, फिर उस संस्था को फोन करके बैच की उम्र, दिन और फीस की पुष्टि कर लें, क्योंकि बच्चों के प्रोग्राम अक्सर सीज़नल होते हैं।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की थिएटर इन एजुकेशन कंपनी, संस्कार रंग टोली, 16 अक्टूबर 1989 को बनी थी और देश में बच्चों के थिएटर का सबसे पुराना सरकारी ढाँचा है। इसमें एक्टर टीचर काम करते हैं, जो स्कूलों में जाकर पाठ्यक्रम से जुड़े और भागीदारी वाले नाटक करते हैं। गर्मियों में दिल्ली और आसपास के केंद्रों में समर थिएटर वर्कशॉप चलती है, उम्र के हिसाब से बैच बनते हैं, और टोली अब तक पंद्रह हज़ार से ज़्यादा बच्चों के साथ काम कर चुकी है। बाल रंग महोत्सव जश्न ए बचपन भी यहीं से होता है।
फायदा उन परिवारों को है जिन्हें कम फीस में गंभीर ट्रेनिंग चाहिए और जो दिल्ली एनसीआर में रहते हैं। सीटें फॉर्म भरने के हिसाब से बहुत कम पड़ती हैं, वेटिंग लिस्ट लंबी होती है, और पहले दिन रिपोर्ट न करने पर सीट अगले उम्मीदवार को चली जाती है। साल भर चलने वाली नियमित हॉबी क्लास की उम्मीद यहाँ न रखें।
नई दिल्ली, बहावलपुर हाउस, भगवानदास रोड, 110001
रंग शंकरा बेंगलुरु के जे.पी. नगर में अपना ऑडिटोरियम चलाता है और 2006 से इसका बच्चों वाला कार्यक्रम आहा! अलग पहचान बना चुका है। इसके तहत सालाना बाल नाट्य उत्सव होता है, गर्मियों में आहा! एक्सप्रेस के नाम से वर्कशॉप लगती हैं, और दो से पाँच साल के बहुत छोटे दर्शकों के लिए भी अलग प्रोडक्शन बनाए जाते हैं। नाटक कन्नड़ और अंग्रेज़ी में होते हैं, और आउटरीच में वंचित परिवारों तथा स्पेशल नीड्स वाले बच्चों को शामिल किया जाता है।
जिन बच्चों को अच्छा नाटक देखने और उसी माहौल में सीखने, दोनों का मौका चाहिए, उनके लिए यह जगह सही है। हिंदी माध्यम के बच्चों को भाषा थोड़ी अटका सकती है, वर्कशॉप ज़्यादातर छुट्टियों के सीज़न में होती हैं, और रजिस्ट्रेशन खुलने के कुछ दिन में भर जाता है, इसलिए कैलेंडर पर नज़र रखनी पड़ती है।
बेंगलुरु, 36/2, 8वाँ क्रॉस, जे.पी. नगर दूसरा फेज़, 560078
पृथ्वी थिएटर 1978 से जुहू के जानकी कुटीर में चल रहा है और मुंबई में बच्चों की समर वर्कशॉप की परंपरा इसी छोटे सभागार से जुड़ी है। गर्मियों में यहाँ बीस से ज़्यादा वर्कशॉप एक साथ चलती हैं, बैच चार से छह, छह से आठ, आठ से बारह साल और टीन्स में बँटे होते हैं। पढ़ाने वाले पेशेवर रंगकर्मी होते हैं, और सिलेबस में एक्टिंग के साथ वॉइस और स्पीच, इम्प्रोवाइज़ेशन, मास्क बनाना, क्ले और लेखन तक आता है। सत्र हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में होते हैं।
यह उन बच्चों के लिए ठीक है जिन्हें अप्रैल से जून के बीच रोज़ का व्यस्त शेड्यूल चाहिए। दिक्कत साफ है: मुख्य कार्यक्रम गर्मियों तक सिमटा है, जुहू पहुँचना उपनगरों से समय खाता है, और लोकप्रिय बैच घोषणा के तुरंत बाद फुल हो जाते हैं।
मुंबई, 20 जानकी कुटीर, जुहू चर्च रोड, जुहू, 400049
गिल्लो रेपर्टरी थिएटर मुंबई की उन कुछ कंपनियों में है जो पूरा ध्यान बच्चों और किशोर दर्शकों पर रखती हैं। हिंदी में इसके नाटक जाने जाते हैं, जैसे महाश्वेता देवी की कहानी पर आधारित "क्यों क्यों लड़की" और छोटे बच्चों के लिए "मिस्टर जीजीभॉय एंड द बर्ड्स"। टीम अर्ली इयर्स थिएटर पर काम करती है, यानी दो से पाँच साल के बच्चों के लिए बने शो, और साथ में ड्रामा क्लब, रीडिंग क्लब तथा स्कूलों में क्रिएटिव वर्कशॉप चलाती है। गिल्लो असीतेज इंडिया के नेटवर्क से भी जुड़ा है।
अगर बच्चा हिंदी में सहज है और आप उसे साहित्य से जुड़ा नाटक दिखाना चाहते हैं, यह विकल्प काम का है। टीम छोटी है, इसलिए बैच और शो का कैलेंडर तय नहीं रहता, वेन्यू शहर के अलग अलग स्टूडियो में बदलते हैं, और सीट के लिए फोन या ईमेल से पूछना ही पड़ता है।
मुंबई, नेहरू नगर
द लिटिल थिएटर को आयशा राव ने 1991 में चेन्नई में शुरू किया था और यह गैर लाभकारी ढंग से चलता है। सबसे बड़ी पहचान इसका सालाना क्रिसमस पैंटोमाइम है, जो म्यूज़ियम थिएटर में दिसंबर में होता है, और इसमें वर्कशॉप के बच्चे ही मंच पर आते हैं। क्रिएटिव वर्कशॉप सितंबर से दिसंबर तक हर शनिवार शाम चलती है, उम्र पाँच से चौदह साल, एक ग्रुप में अधिकतम पच्चीस बच्चे। ड्रामा के साथ माइम, संगीत, जादू, पपेट्री, मिट्टी और क्राफ्ट भी सिखाया जाता है। संस्था बच्चों के लिए अंतरराष्ट्रीय नाट्य उत्सव भी करती है।
यह उन बच्चों के लिए है जिन्हें साफ लक्ष्य चाहिए, क्योंकि तीन महीने की मेहनत सीधे बड़े शो में बदलती है। काम मुख्य रूप से अंग्रेज़ी में होता है, बैच छोटा रखने की वजह से जगह कम रहती है, और पूरा साइकल साल में एक बार ही खुलता है।
चेन्नई, 39/46 राम्स स्क्वायर, 2 विलेज रोड, नुंगमबक्कम
बैंगलोर लिटिल थिएटर 1960 से चल रहा है और शहर की सबसे पुरानी थिएटर संस्थाओं में गिना जाता है। बच्चों वाला हिस्सा इसकी अकादमी ऑफ थिएटर आर्ट्स संभालती है, जो थिएटर इन एजुकेशन पर काम करती है: स्कूलों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करना, शिक्षकों की ट्रेनिंग, कहानी कहने और संवाद कौशल पर सत्र। संस्था खास तौर पर कम आय वाले परिवारों और सरकारी स्कूलों के बच्चों तक पहुँचने पर ज़ोर देती है, और इसके इंटरैक्टिव शो कक्षा के भीतर भी होते हैं।
जिन स्कूलों या एनजीओ को पूरे समूह के लिए ड्रामा प्रोग्राम चाहिए, उनके लिए यह मजबूत साझेदार है। अलग अलग बच्चों को सीधे दाखिला देने वाले बैच कम होते हैं, शेड्यूल स्वयंसेवी टीम पर निर्भर रहता है, और वेबसाइट पर जानकारी हमेशा ताज़ा नहीं मिलती, इसलिए फोन करना जरूरी हो जाता है।
बेंगलुरु, 248, 13वाँ क्रॉस, विल्सन गार्डन, 560027
थिएटर प्रोफेशनल्स मुंबई से काम करती है और स्कूलों में ड्रामा इन एजुकेशन लागू करने में इसका नाम है। मॉडल सीधा है: प्रशिक्षित ड्रामा फैसिलिटेटर स्कूल के अंदर नियमित कक्षाएँ लेते हैं, शिक्षकों को तरीके सिखाए जाते हैं, और पाठ्यक्रम स्कूल की उम्र संरचना के हिसाब से बनता है। इसी टीम ने ड्रामा स्कूल मुंबई की स्थापना की, जहाँ बड़े उम्र के छात्र पेशेवर ट्रेनिंग लेते हैं, और कॉर्पोरेट के लिए संवाद तथा लीडरशिप पर सत्र भी चलते हैं। दफ्तर दादर पारसी कॉलोनी में है।
अभिभावक के लिए मतलब यह है कि बच्चा स्कूल में ही ड्रामा पढ़ सकता है, अलग क्लास ढूँढने की ज़रूरत नहीं। बाहर से व्यक्तिगत दाखिला सीमित रहता है, फीस अक्सर स्कूल तय करता है, और अगर स्कूल इनसे नहीं जुड़ा तो बच्चे तक कार्यक्रम पहुँचना मुश्किल है।
मुंबई, 797 जामे जमशेद रोड, दादर पारसी कॉलोनी, 400014
कैवल्य प्लेज़ दिल्ली एनसीआर से चलने वाला परफॉर्मिंग आर्ट्स समूह है, जो एप्लाइड थिएटर और ड्रामा इन एजुकेशन पर काम करता है। स्कूलों के लिए इसके प्रोग्राम भावनात्मक और सामाजिक कौशल पर टिके हैं: सहयोग, संवाद, विवाद सुलझाना, और सामने खड़े होकर बात रखना। ट्रेनिंग की जड़ इम्प्रोवाइज़ेशन में है, यानी बच्चों को रटा हुआ स्क्रिप्ट नहीं, तुरंत सोचकर सीन बनाना सिखाया जाता है। भारत के भीतर सत्र आमने सामने होते हैं और विदेश के स्कूलों के लिए ऑनलाइन मॉड्यूल भी मौजूद हैं।
यह उन स्कूलों और बड़े बच्चों के लिए बेहतर है जो शर्म तोड़ने और मंच पर सहज होने का काम करना चाहते हैं। बहुत छोटे बच्चों के लिए तैयार खुला बैच कम मिलता है, फीस और शेड्यूल पूछताछ पर तय होते हैं, और काम का दायरा मुख्य रूप से दिल्ली और गुरुग्राम तक है।
नई दिल्ली
एनसीपीए नरीमन पॉइंट का बड़ा कला केंद्र है, और बच्चों के लिए इसका सबसे व्यस्त कार्यक्रम समर फिएस्टा है, जो 2010 में शुरू हुआ। हर गर्मी में तीन से उन्नीस साल तक के बच्चों के लिए थिएटर, पपेट्री, डांस, फोटोग्राफी, क्रिएटिव राइटिंग, कविता और एनिमेशन फिल्ममेकिंग की वर्कशॉप एक साथ चलती हैं, बीच में उनके लिए चुने गए नाटक और फिल्में भी दिखाई जाती हैं। सिखाने वाले पेशेवर होते हैं, और युवाओं के लिए एनसीपीए नेशनल थिएटर यूके के साथ कनेक्शंस इंडिया जैसा प्रोजेक्ट भी करता है।
एक ही छत के नीचे कई कलाएँ आज़माने का मौका इसकी सबसे बड़ी ताकत है। फीस बाकी विकल्पों से ऊँची रहती है, कार्यक्रम अप्रैल मई तक सीमित है, दक्षिण मुंबई तक रोज़ आना जाना उपनगरों के परिवारों पर भारी पड़ता है, और लोकप्रिय स्लॉट बुकिंग खुलते ही चले जाते हैं।
मुंबई, एनसीपीए मार्ग, नरीमन पॉइंट, 400021
सूत्रधार हैदराबाद का नाट्य समूह है, जिसकी अगुवाई रंगकर्मी विनय वर्मा करते हैं, और इसका स्कूल ऑफ एक्टिंग हिमायतनगर में चलता है। यहाँ वयस्कों के फाउंडेशन कोर्स के साथ बच्चों और किशोरों के लिए छुट्टियों में अलग बैच लगते हैं, जिनमें शरीर, आवाज़, इम्प्रोवाइज़ेशन और सीन वर्क पर काम होता है। समूह हिंदी, अंग्रेज़ी और तेलुगु, तीनों भाषाओं में नाटक करता है, इसलिए बच्चा जिस भाषा में सहज हो, उसी में मंच पर आ सकता है।
तेलंगाना और आसपास के परिवारों के लिए यह गिने चुने भरोसेमंद विकल्पों में है, खासकर तब जब बच्चा गंभीरता से एक्टिंग सीखना चाहता है। स्पेस बड़ा नहीं है, बच्चों के बैच मुख्य रूप से गर्मियों में खुलते हैं, और संस्था का मुख्य ध्यान वयस्क छात्रों पर रहता है, इसलिए बच्चों की जानकारी फोन पर ही ठीक से मिलती है।
हैदराबाद, हिमायतनगर