घर की रसोई से हर दिन सब्जी के छिलके, चाय की पत्ती और बचा खाना निकलता है. यही गीला कचरा घर पर ही खाद बन सकता है, बस सही डिब्बा चाहिए. यह रेटिंग उन लोगों के लिए है जो बालकनी, छत या किचन के कोने में एक घरेलू कंपोस्ट बिन रखना चाहते हैं और उलझन में हैं कि टेराकोटा लें, प्लास्टिक का एरोबिक सेट लें या बोकाशी बाल्टी.
चुनाव में तीन चीजें देखी गईं. पहली, क्षमता और परिवार का आकार: दो लोगों के घर के लिए 10 से 15 लीटर काफी है, चार से छह लोगों के लिए 25 लीटर से ऊपर चाहिए. दूसरी, बनावट और सामान: मिट्टी है या यूवी सुरक्षित प्लास्टिक, लीचेट निकालने की टोंटी है या नहीं, माइक्रोब पाउडर, छलनी और रेक साथ मिलते हैं या अलग खरीदने पड़ेंगे. तीसरी, रोज का इस्तेमाल: बदबू, मक्खी, सफाई, खाद तैयार होने में लगने वाला समय और भारत में असली कीमत. हर मॉडल Amazon या Flipkart पर आम खरीदार के लिए उपलब्ध है.
क्रम यहां संपादकों ने तय नहीं किया, जगह लोगों के वोट से बदलती रहती है. कार्ड में दिए फायदे और नुकसान दोनों पढ़ें, फिर नीचे के रिव्यू देखें. अपने घर का कचरा रोज कितना निकलता है, उसी हिसाब से आकार चुनें.
तीन टेराकोटा मटकों का स्टैक, जो एक के ऊपर एक रखे जाते हैं. ऊपर वाले में रोज का गीला कचरा डालते हैं, भरने पर क्रम बदल देते हैं. कंपनी इसे चार से पांच लोगों के परिवार के लिए बताती है, यानी रोज करीब एक किलो कचरा. मिट्टी की दीवार से हवा आती जाती रहती है, इसलिए मिश्रण गीला होकर सड़ता नहीं. खाद चार से छह हफ्ते में तैयार होती है. सेट में रेमिक्स पाउडर, रेक और मैनुअल मिलता है.
बालकनी, छत या गैलरी के कोने के लिए ठीक बैठता है, देखने में भी अच्छा लगता है. मिट्टी का सामान है, ठोकर लगने पर चटक सकता है, इसलिए जगह एक बार तय करके स्थिर रख दें. बार बार घर बदलने वालों के लिए ढुलाई सिरदर्द है. दाम प्लास्टिक बिन से ज्यादा है, पर हिस्से अलग से बदले जा सकते हैं.
डेली डंप के खंभे जैसा ही वर्टिकल स्टैक, पर पूरी डीआईवाई किट के साथ आता है. डिब्बे में तीन टेराकोटा पॉट, एक ढक्कन, एक किलो कोकोपीट, एक किलो तैयार खाद, रेक, छलनी और निर्देश पुस्तिका मिलती है. मिट्टी बिना ग्लेज की है, इसलिए नमी बाहर निकलती रहती है और मिश्रण चिपचिपा नहीं होता. कंपनी चार से छह हफ्ते में खाद बनने की बात कहती है.
पहली बार कंपोस्टिंग करने वालों के लिए सुविधाजनक, क्योंकि शुरुआती सामान अलग से नहीं खरीदना पड़ता. आकार छोटा है, दो से तीन लोगों का घर आराम से चला लेगा, बड़े परिवार को कचरा जल्दी भरता दिखेगा. हाथ से बने पॉट हैं, नाप और रंग में थोड़ा फर्क आता है. ट्रांजिट में चटकने की शिकायतें भी मिलती हैं, डिलीवरी के समय डिब्बा खोलकर देख लेना बेहतर है.
चौदह लीटर की दो बाल्टियों का सेट, जो बोकाशी यानी अवायवीय तरीके पर चलता है. हर बाल्टी में टोंटी लगी है, जिससे नीचे जमा तरल निकालकर पानी में मिलाकर पौधों में डाला जा सकता है. किट में बोकाशी कंपोस्ट मेकर पाउडर, गुड़ और निर्देश पुस्तिका आती है. कचरा डालकर ऊपर पाउडर छिड़कना है और ढक्कन बंद रखना है, हिलाने या रोज मिलाने की जरूरत नहीं.
बंद ढक्कन की वजह से यह किचन के अंदर या सिंक के नीचे रखा जा सकता है, फ्लैट में रहने वालों के लिए यही बड़ी बात है. दो लोगों के घर के लिए एक जोड़ी काफी है. ध्यान रखें कि बाल्टी में जो निकलता है वह अभी अधपका है, उसे मिट्टी में दबाकर दो तीन हफ्ते और रखना पड़ता है. पाउडर बार बार खरीदना पड़ेगा, यह चलता खर्च है.
बीस लीटर की बाल्टी वाला किट, जो एक, दो या तीन बिन के सेट में मिलता है. हर बिन में हैंडल, ढक्कन, टोंटी, अंदर की छलनी, कल्टिवेटर और दो तरह के पाउडर मिलते हैं: कंपोस्टार्ट और कंपोनीम. काम बोकाशी तरीके पर होता है, इसलिए पका खाना, दाल और चावल भी डाला जा सकता है. Flipkart पर एक बिन वाला सेट अक्सर डेढ़ हजार रुपये के आसपास बिकता है.
दो लोगों के घर के लिए एक बिन, चार से पांच लोगों के लिए तीन बिन वाला सेट सही रहता है, क्योंकि एक भरने पर दूसरा शुरू होता है. प्लास्टिक हल्का है, उठाकर छत तक ले जाना आसान. टोंटी का जोड़ कुछ यूनिट में टपकने की शिकायत करता है, नीचे तश्तरी रख लें. जो लोग बिना पाउडर के सिर्फ सूखी पत्तियों से खाद बनाना चाहते हैं, उन्हें यह तरीका पसंद नहीं आएगा.
पैंतीस लीटर के दो बिन का एरोबिक सेट, तीन से छह लोगों के परिवार के लिए बनाया गया. हर बिन एचडीपीई प्लास्टिक का है, नाप करीब 30 गुणा 30 सेंटीमीटर और ऊंचाई 55 सेंटीमीटर. साथ में दो स्टैंड मिलते हैं, ताकि बिन ऊंचा रहे और टोंटी से कंपोस्ट टी नीचे रखे डिब्बे में गिरे. रेक भी शामिल है, जिससे कचरा ऊपर से मिलाया जाता है. जोड़ी की कीमत तीन हजार रुपये के आसपास रहती है.
एक बिन भरने पर दूसरा शुरू कर देते हैं, पहला पकने के लिए छोड़ दिया जाता है. यही जोड़ी वाला तरीका इसे बड़े परिवारों के लिए काम का बनाता है. एक कमी साफ है: हवा के छेद ज्यादातर ढक्कन में हैं, बगल में नहीं, इसलिए कचरा ज्यादा भर जाए तो नीचे हवा कम पड़ती है और मिलाना जरूरी हो जाता है. ऊंचाई भी अच्छी खासी है, छोटी बालकनी में स्टैंड समेत जगह नापकर रखें.
तीस लीटर की बंद बाल्टी, जो जापानी बोकाशी तरीके पर चलती है. हवा रोककर किण्वन होता है, इसलिए मांस, मछली और बचा हुआ चावल भी डाला जा सकता है, जो आम एरोबिक बिन में मना रहता है. नीचे टोंटी लगी है, हर दो तीन दिन में तरल निकालना पड़ता है. सेट में बोकाशी ब्रान मिलता है, दो बिन का पैक भी बिकता है. रंग सफेद हरा और सफेद नीला दोनों में उपलब्ध.
फ्लैट में रहने वाले परिवार के लिए ठीक, क्योंकि ढक्कन बंद रहने से मक्खी और बदबू बाहर नहीं आती. तीस लीटर की एक बाल्टी चार लोगों के घर में करीब तीन से चार हफ्ते चल जाती है. साफ रहे, यह अंतिम खाद नहीं देती: भरने के बाद सामग्री दो हफ्ते बंद रहती है, फिर मिट्टी या गमले में दबानी पड़ती है. जिनके पास बगीचा या बड़ा गमला नहीं, उनके लिए यह आखिरी कदम मुश्किल है.
पच्चीस लीटर के बिन के साथ पांच लीटर माइक्रोब मिश्रण वाला सेट. रोज करीब आधा किलो रसोई कचरा संभालने के हिसाब से बना है, यानी दो से तीन लोगों का घर. तरीका सीधा है: कचरा डालो, ऊपर माइक्रोब की एक मुट्ठी छिड़को, ढक्कन बंद. पचास लीटर वाला बड़ा संस्करण भी बिकता है, जो रोज एक किलो कचरा लेता है. दाम इसी श्रेणी के बाकी सेटों से कम रहता है.
जो लोग पहली बार खाद बनाना सीख रहे हैं और ज्यादा पैसे नहीं लगाना चाहते, उनके लिए यह ठीक शुरुआत है. साथ आने वाला माइक्रोब बैग कई महीने चलता है. प्लास्टिक की मोटाई डेली डंप या सम्पूर्ण जैसे सेट के बराबर नहीं लगती, धूप में लंबे समय रखने पर रंग उड़ता है. मिश्रण गीला हो जाए तो बदबू आती है, इसलिए सूखी पत्ती या कोकोपीट साथ रखना पड़ेगा.
पैंसठ लीटर के दो बड़े बिन, जो बालकनी से ज्यादा आंगन, छत या पार्किंग के कोने के लिए बने हैं. बॉडी वर्जिन एलएलडीपीई की है और यूवी स्टेबलाइज्ड, यानी खुली धूप में सालों टिकने का दावा. कंपनी के मुताबिक इसमें मांस, मछली, सब्जी के छिलके, पका चावल और सालन तक डाला जा सकता है, काम माइक्रोब और लार्वा दोनों से होता है. साथ में दो पैकेट कंपोस्ट बूस्टर पाउडर मिलता है.
बड़े परिवार, संयुक्त परिवार या दो तीन घरों के साझा इस्तेमाल के लिए सही आकार. जिनके पास सिर्फ छोटी बालकनी है, उनके लिए यह बहुत बड़ा है, खाली बिन भी काफी जगह घेरता है. बाहर रखना जरूरी है, इसलिए बारिश से बचाव और नीचे समतल जगह देखनी होगी. ब्रांड ज्यादातर दक्षिण भारत में जाना जाता है, सर्विस के लिए कंपनी से सीधे बात करनी पड़ती है.
पंद्रह लीटर के चार बिन, जो एक के ऊपर एक जमते हैं. यह डेली डंप का प्लास्टिक वाला विकल्प है, टेराकोटा से हल्का और सस्ता. मॉड्यूलर होने का फायदा यह है कि परिवार बढ़ने पर बिन जोड़े जा सकते हैं, और किराए के घर में शिफ्ट करते समय अलग करके ले जाना आसान है. किट में कंपोस्ट मेकर पाउडर, रेक और मैनुअल मिलता है, तरीका एरोबिक है यानी बीच बीच में मिलाना पड़ता है.
चार सदस्यों तक के परिवार के लिए ठीक, रोज करीब आधा से एक किलो कचरा. छोटी बालकनी वालों के लिए यह खंभे से बेहतर बैठता है, क्योंकि गिरने पर टूटता नहीं. दूसरी तरफ मिट्टी जैसी सांस लेने वाली दीवार यहां नहीं है, इसलिए मिश्रण गीला हो तो बदबू जल्दी आती है और सूखी पत्ती या कोकोपीट ज्यादा डालनी पड़ती है. दिखने में यह सादा प्लास्टिक स्टैक ही है.
बीस लीटर का बिन, जिसे कंपनी रसोई के कूड़ेदान की जगह रखने के लिए बनाती है. हर बिन के साथ छलनी, स्टैंड और टोंटी आती है, तथा Bio Bloom Air नाम का माइक्रोब मिश्रण मिलता है. काम का तरीका सीधा है: कचरा डालो, ऊपर मिश्रण की परत डालो, ढक्कन बंद. दस लीटर वाला छोटा संस्करण तीन बिन के सेट में भी बिकता है, जो एक से चार सदस्यों के घर के लिए बताया जाता है.
रोज मिलाने या पलटने की जरूरत नहीं, इसलिए व्यस्त लोगों के काम का है. स्टैंड की वजह से टोंटी से तरल आसानी से निकल जाता है. कमी यह है कि Bio Bloom मिश्रण कंपनी से ही लेना पड़ता है, स्थानीय दुकान पर नहीं मिलता, और तीन किलो का बैग एक परिवार में करीब डेढ़ महीने चलता है. Amazon पर स्टॉक कभी कभी खत्म रहता है, तब कंपनी की साइट देखनी पड़ती है.