भारत में पढ़ने की जगह ढूँढ़ना आसान नहीं है, और यह रेटिंग उन्हीं पाठकों के लिए बनी है जिन्हें भरोसेमंद वाचनालय, सस्ती सदस्यता और गंभीर संग्रह चाहिए। यहाँ देश के वे सार्वजनिक पुस्तकालय हैं जहाँ आम नागरिक बिना सिफ़ारिश के अंदर जा सकता है, दिन भर बैठकर पढ़ सकता है और नियम पूरे करके किताब घर ले जा सकता है। छात्र, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले, शोधार्थी और वे लोग जो पुरानी पांडुलिपियों में झाँकना चाहते हैं, सबको यह सूची काम की लगेगी।
चयन सीधे आधार पर हुआ: संग्रह का आकार और भाषाओं की विविधता, सदस्यता की शर्तें और शुल्क, वाचनालय के खुलने का समय, बैठने की क्षमता, बच्चों और दृष्टिबाधित पाठकों के लिए अलग खंड, कैटलॉग तथा डिजिटल सेवाओं की हालत। इसके साथ यह भी देखा गया कि पुस्तकालय किस विभाग या मंत्रालय के अधीन है, निक्षेपागार का दर्जा रखता है या नहीं, और उसकी इमारत तक पहुँचना कितना सुविधाजनक है। ऐतिहासिक पुस्तकालयों के मामले में पांडुलिपि विभाग की पहुँच और संरक्षण के तरीक़े भी गिने गए।
क्रम संपादकों की पसंद से तय नहीं होता: स्थान सामुदायिक वोटों से बदलते रहते हैं, इसलिए आज का पहला नंबर कल दूसरा हो सकता है। हर कार्ड में प्लस और माइनस अलग से लिखे गए हैं, और नीचे पाठकों के अपने अनुभव जुड़ते जाते हैं। जिस पुस्तकालय में जाने का मन हो, उसके प्लस, माइनस और ताज़ा टिप्पणियाँ पढ़कर तय करें, और अपना वोट डालकर सूची को दूसरों के लिए बेहतर बनाएँ।
1836 में कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी के रूप में शुरू हुआ यह संस्थान 1903 में इम्पीरियल लाइब्रेरी बना और 1 फ़रवरी 1953 को राष्ट्रीय पुस्तकालय के नाम से पूरे देश के लिए खोला गया। संस्कृति मंत्रालय के अधीन चलता है, संग्रह बीस लाख से ऊपर है और भारत में छपी हर महत्वपूर्ण सामग्री की एक प्रति यहाँ जमा होती है। भाषा भवन, दुर्लभ पुस्तक विभाग, पांडुलिपि खंड और नक़्शों का संग्रह अलग-अलग इमारतों में बँटे हैं। अठारह साल से ऊपर का कोई भी नागरिक निःशुल्क सदस्य बन सकता है, पंजीकरण फ़ॉर्म वेबसाइट से भी भरा जा सकता है।
शोध करने वालों और पुराने अख़बारों, सरकारी दस्तावेज़ों, दुर्लभ ग्रंथों तक पहुँचने वालों के लिए इससे बेहतर पता देश में नहीं है। जो पाठक हल्का उपन्यास लेकर शाम बिताना चाहता है, उसे यहाँ की औपचारिकताएँ भारी लगेंगी। बेल्वेडियर एस्टेट का परिसर बड़ा है, पहली बार आने पर विभाग ढूँढ़ने में समय लगता है, और ऑनलाइन कैटलॉग रखरखाव के चलते कभी-कभी बंद रहता है।
कोलकाता, बेल्वेडियर रोड, अलीपुर, पश्चिम बंगाल 700027
दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी 27 अक्तूबर 1951 को यूनेस्को की पायलट परियोजना के तौर पर शुरू हुई और जवाहरलाल नेहरू ने इसका उद्घाटन किया था। आज यह संस्कृति मंत्रालय के अधीन स्वायत्त संस्था है, नेटवर्क में करीब 37 शाखाएँ हैं, और संग्रह अठारह लाख किताबों से ऊपर पहुँच चुका है, जिनमें हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, पंजाबी और संस्कृत की सामग्री शामिल है। ब्रेल पुस्तकालय, तिहाड़ जेल की शाखा, पुनर्वास कॉलोनियों की छोटी इकाइयाँ और चलती-फिरती मोबाइल लाइब्रेरी बसें इसे बाकी सरकारी पुस्तकालयों से अलग करती हैं।
दिल्ली में रहने वाले छात्र के लिए बड़ा फ़ायदा यह है कि शाखा घर के पास मिल जाती है और सदस्य बनकर किताब उधार ली जा सकती है। कमज़ोरी प्रक्रिया में है: फ़ॉर्म पर ज़िम्मेदार व्यक्ति का सत्यापन चाहिए, और कई पुरानी शाखाओं में जगह तथा साज-सज्जा की हालत औसत है। परीक्षा के मौसम में केंद्रीय शाखा के वाचनालय में कुर्सी मिलना मुश्किल होता है।
दिल्ली, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग, पुरानी दिल्ली 110006
एग्मोर के संग्रहालय परिसर में खड़ी कॉनेमारा पब्लिक लाइब्रेरी का शिलान्यास 1890 में हुआ और 5 दिसम्बर 1896 को यह जनता के लिए खुली। यह देश के उन चार निक्षेपागार पुस्तकालयों में से एक है जिन्हें भारत में प्रकाशित हर किताब, अख़बार और पत्रिका की प्रति मिलती है, साथ ही यह संयुक्त राष्ट्र के दस्तावेज़ों का डिपॉजिटरी भी है। संग्रह छह लाख किताबों के आसपास है, इसमें सौ साल पुरानी जिल्दें, अख़बारों की बंधी फाइलें और ब्रेल सामग्री शामिल है। इंडो सारसेनिक शैली की सागौन लकड़ी वाली मुख्य हॉल अपने आप में देखने लायक है।
तमिलनाडु के लोक पुस्तकालय विभाग के अधीन चलती है, प्रवेश निःशुल्क है और सुबह से शाम तक पाठक बैठ सकते हैं। इतिहास, पुराने प्रकाशन और अख़बारी अभिलेख खोजने वालों के लिए यह जगह अनमोल है। जो सिर्फ़ नई किताब उधार लेने आया है, उसे ध्यान रखना चाहिए कि दुर्लभ और निक्षेपागार सामग्री केवल परिसर में पढ़ी जा सकती है। डिजिटल कैटलॉग सीमित है, इसलिए स्टाफ़ से पूछना पड़ता है।
चेन्नई, पैंथियन रोड, एग्मोर, तमिलनाडु 600008
पटना के अशोक राजपथ पर खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी 1891 में जनता को समर्पित हुई थी, जब खान बहादुर खुदा बख्श ने पिता से मिली निजी पांडुलिपियाँ सबके लिए खोल दीं। 1969 के संसदीय अधिनियम के बाद यह राष्ट्रीय महत्व की स्वायत्त संस्था है और पूरा खर्च संस्कृति मंत्रालय उठाता है। संग्रह में करीब इक्कीस हज़ार प्राच्य पांडुलिपियाँ और ढाई लाख मुद्रित पुस्तकें हैं, जिनमें अरबी, फ़ारसी और उर्दू की दुर्लभ प्रतियाँ, सचित्र ग्रंथ तथा सुलेख के नमूने शामिल हैं। पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण का काम लगातार चलता रहता है।
इस्लामी अध्ययन, मध्यकालीन इतिहास और उर्दू फ़ारसी साहित्य पर काम करने वाले शोधार्थी के लिए यह पहली मंज़िल है, और सालाना व्याख्यान तथा प्रदर्शनियाँ इसे जीवंत रखती हैं। आम पाठक को यह ध्यान रखना चाहिए कि संग्रह शोध की ओर झुका है, लोकप्रिय आधुनिक साहित्य कम है। दुर्लभ पांडुलिपि देखने के लिए पहले अनुमति लेनी पड़ती है और नियम सख़्त हैं।
पटना, अशोक राजपथ, बिहार 800004
तंजावुर महाराजा सरफोजी सरस्वती महल पुस्तकालय की शुरुआत 1535 के आसपास नायक राजाओं के शाही संग्रह से मानी जाती है, और मराठा शासक सरफोजी द्वितीय के समय इसका सबसे बड़ा विस्तार हुआ। 1918 में यह जनता के लिए खोली गई और अब सोसाइटी के रूप में पंजीकृत है। यहाँ तमिल, तेलुगु, संस्कृत, मराठी और अंग्रेज़ी की करीब सैंतालीस हज़ार पांडुलिपियाँ तथा ताड़पत्र सुरक्षित हैं, साथ में चिकित्सा, संगीत, ज्योतिष और साहित्य के दुर्लभ ग्रंथ, नक़्शे और चित्र। परिसर तंजावुर महल के भीतर है, इसलिए एक ही यात्रा में महल और पुस्तकालय दोनों देखे जा सकते हैं।
संस्कृत तथा तमिल पांडुलिपियों पर काम करने वाले विद्वानों और इतिहास के शौकीन यात्रियों के लिए यह जगह बनी है। रोज़मर्रा की पढ़ाई या नई किताबें उधार लेने की सोच रखने वाले पाठक को यहाँ काम भर की सामग्री नहीं मिलेगी। बुधवार और सरकारी अवकाश पर बंद रहती है, दोपहर में विराम होता है, और बड़ा हिस्सा संग्रहालय शैली में प्रदर्शित है।
तंजावुर, महल परिसर, तमिलनाडु 613009
karnatakadigitalpubliclibrary.org
कब्बन पार्क के किनारे खड़ा लाल शेषाद्री अय्यर मेमोरियल हॉल बेंगलुरु की पहचान है, और इसी नव शास्त्रीय इमारत में कर्नाटक का राज्य केंद्रीय पुस्तकालय चलता है। यह लोक पुस्तकालय विभाग के अधीन राज्य का प्रमुख पुस्तकालय है, कन्नड़, अंग्रेज़ी, हिंदी, उर्दू और तमिल की किताबें, अख़बार तथा पत्रिकाएँ मिलती हैं, और दृष्टिबाधित पाठकों के लिए ब्रेल खंड अलग है। वाचनालय में बैठकर पढ़ना निःशुल्क है, किताब घर ले जाने के लिए मामूली शुल्क वाली सदस्यता बनवानी पड़ती है। विभाग का डिजिटल पोर्टल ई किताबें और सदस्यता की जानकारी भी देता है।
शहर के बीच में शांत जगह चाहने वाले छात्र, नौकरी की तैयारी करने वाले और अख़बार पढ़ने के आदी बुज़ुर्ग यहाँ रोज़ आते हैं। इमारत सौ साल से ज़्यादा पुरानी है, इसलिए लिफ़्ट और आधुनिक सुविधाओं की उम्मीद रखने वालों को समझौता करना पड़ेगा। सुबह देर से पहुँचने पर बैठने की जगह नहीं बचती, और कैटलॉग खोज पुरानी शैली की है।
बेंगलुरु, कब्बन पार्क, अंबेडकर वीधी के पास, कर्नाटक 560001
तिरुवनंतपुरम का राज्य केंद्रीय पुस्तकालय, जिसे लोग त्रिवेंद्रम पब्लिक लाइब्रेरी भी कहते हैं, 1829 में स्वाति तिरुनाल महाराजा के समय बना और देश के सबसे पुराने पुस्तकालयों में गिना जाता है। 1898 में यह आम जनता के लिए खुला और 1958 में इसे राज्य केंद्रीय पुस्तकालय का दर्जा मिला; पालयम की गॉथिक शैली की इमारत अपने आप में शहर की निशानी है। सदस्यता की जमा राशि श्रेणी के हिसाब से सौ रुपये से पंद्रह सौ रुपये तक है, मासिक चंदा नहीं लिया जाता, और सदस्यता छोड़ने पर जमा राशि वापस मिल जाती है। देर से किताब लौटाने पर प्रतिदिन एक रुपया जुर्माना लगता है।
मलयालम साहित्य, संदर्भ ग्रंथ और अख़बारों के पुराने अंक खोजने वालों के लिए यह केरल का मुख्य पता है, और यहीं से पुस्तकालय विज्ञान का सर्टिफ़िकेट कोर्स भी चलता है। श्रेणी के अनुसार एक बार में मिलने वाली किताबों की संख्या तय है, संग्रह मलयालम की ओर झुका है, और ऑनलाइन सेवाएँ सीमित हैं।
तिरुवनंतपुरम, महात्मा गांधी रोड, पालयम, केरल 695033
कृष्णदास शामा गोवा राज्य केंद्रीय पुस्तकालय की शुरुआत 1832 में पुर्तगाली शासन के दौरान "पब्लिका लिव्रारिया" के रूप में हुई थी, और इसे भारत का पहला सार्वजनिक पुस्तकालय बताया जाता है। 2012 में यह पणजी के पट्टो में बनी नई इमारत में आया, जहाँ 12,100 वर्ग मीटर निर्मित क्षेत्र और 27 खंड हैं। संग्रह तीन लाख से ज़्यादा किताबों का है: अंग्रेज़ी, हिंदी, मराठी, कोंकणी और पुर्तगाली में। पूरी इमारत वातानुकूलित है, आरएफ़आईडी आधारित चेक इन कियोस्क और बुक ड्रॉप बॉक्स से किताब लौटाना तेज़ हो जाता है।
परिवार के साथ आने वालों के लिए दूसरी मंज़िल का बाल खंड सबसे मज़बूत हिस्सा है, वहाँ लगभग 22,800 किताबें, खिलौने और खेल हैं; दृष्टिबाधित पाठकों के लिए ब्रेल किताबें, ब्रेल पत्रिकाएँ, मानचित्र और चार्ट अलग रखे गए हैं। पणजी बस स्टैंड के पास होने से पहुँच आसान है। जिन्हें बहुत विशिष्ट शोध सामग्री चाहिए, उन्हें गोवा और कोंकणी केंद्रित संग्रह से आगे बाहर देखना पड़ेगा।
संस्कृति भवन, पट्टो, पणजी, गोवा 403001