अपना काम शुरू करना है, पर नया नाम खड़ा करने में सालों नहीं देने? यह रेटिंग ऐसे ही लोगों के लिए बनी है। यहाँ भारत में फ्रेंचाइज़ी देने वाले ब्रांड एक साथ रखे गए हैं, ताकि पैसा लगाने से पहले हिसाब साफ़ दिखे: कितनी लागत, कितनी जगह, कमाई कब से।
चुनाव में तीन बातें सबसे ऊपर रखी गईं। पहली, ब्रांड भारत में सच में फ्रेंचाइज़ी देता हो और उसका आवेदन रास्ता खुला हो, बड़ा नाम होना अकेले काफ़ी नहीं। दूसरी, शुरुआती लागत, फ्रेंचाइज़ फीस और रॉयल्टी पता हो, वरना पहला साल गड़बड़ हो जाता है। तीसरी, नेटवर्क का आकार और असली मदद: ट्रेनिंग, सप्लाई, दुकान का डिज़ाइन, मार्केटिंग। छोटे कियोस्क मॉडल अलग से देखे गए, क्योंकि हर किसी के पास बड़ी जगह और मोटा बजट नहीं होता।
क्रम संपादक तय नहीं करते, वोट समुदाय के हैं, इसलिए जगहें बदलती रहती हैं। हर कार्ड में प्लस और माइनस दिए गए हैं, नीचे लोगों के अनुभव भी पढ़े जा सकते हैं। अपने शहर का किराया, भीड़ और मुकाबला जोड़कर ही फ़ैसला करें। और शर्तें ब्रांड से लिखित में लेना कभी न भूलें, बात मुँह से नहीं, कागज़ से पक्की होती है।
अमूल गुजरात की दूध सहकारी संस्था GCMMF का ब्रांड है और इसका पार्लर मॉडल सबसे सस्ते रास्तों में गिना जाता है। कंपनी की फ्रेंचाइज़ी पेज के हिसाब से दुकान 100 से 400 वर्ग फुट की चाहिए, अच्छी भीड़ वाली जगह पर। लगाने वाली रकम तकरीबन डेढ़ से पाँच लाख रुपये रहती है, जिसमें वापस होने वाली सिक्योरिटी और फ्रिज, फ्रीज़र जैसा सामान शामिल है। रॉयल्टी नहीं ली जाती, कमाई तय मार्जिन से आती है, जो दूध की थैली पर कम और आइसक्रीम, स्कूपिंग पर ज़्यादा होता है।
यह मॉडल उन लोगों के लिए ठीक है जिनके पास पहले से दुकान या शटर है और जो रोज़ की भागदौड़ खुद कर सकते हैं। माल नज़दीकी होलसेल डीलर से आता है, इसलिए सप्लाई की रफ़्तार इलाके पर टिकी है। बहुत बड़ा मुनाफ़ा एक पार्लर से नहीं बनता, पैसा रोज़ की बिक्री और भीड़ से बनता है।
लेंसकार्ट 2010 में पीयूष बंसल ने शुरू किया था और आज यह देश की सबसे बड़ी आईवियर चेन है, जिसके स्टोर सैकड़ों शहरों में फैले हैं। फ्रेंचाइज़ी FOFO तरीके से दी जाती है: दुकान और स्टाफ़ पार्टनर का, माल, सॉफ़्टवेयर, आँख जाँचने की मशीन और ट्रेनिंग कंपनी की तरफ़ से। निवेश करीब 30 से 40 लाख रुपये बताया जाता है और पार्टनर को शुद्ध बिक्री का एक हिस्सा मिलता है, ब्रेक ईवन आमतौर पर सवा से डेढ़ साल में।
रकम बड़ी है, इसलिए यह पहली छोटी दुकान वालों का काम नहीं। ठीक बैठता है उन लोगों पर जिनके पास मेन मार्केट या मॉल में जगह है और जो लंबा खेल खेल सकते हैं। ऑनलाइन बिक्री उसी ब्रांड की चलती रहती है, इसलिए दाम अपनी मर्ज़ी से बढ़ाने की छूट नहीं मिलती।
वाओ मोमो 2008 में कोलकाता में सागर दरियानी और बिनोद होमागाई ने एक छोटे स्टॉल से शुरू किया था। आज चेन के 600 से ज़्यादा आउटलेट हैं और मेन्यू में मोमो के साथ मोमो बर्गर, चाइनीज़ और आइसक्रीम वाले वाओ! चाइना, वाओ! आइस ब्रांड भी जुड़े हैं। फ्रेंचाइज़ी के लिए कंपनी अलग साइट चलाती है, जहाँ आवेदन, लोकेशन जाँच और सेटअप का पूरा तरीका लिखा है। कियोस्क से लेकर पूरी दुकान तक कई फ़ॉर्मैट हैं, इसलिए बजट के हिसाब से चुना जा सकता है।
फ़ूड कोर्ट, मेट्रो स्टेशन और कॉलेज के पास वाली जगहों पर यह मॉडल सबसे अच्छा चलता है। किचन छोटा रहता है, पर स्टाफ़ और सफ़ाई का अनुशासन सख़्त चाहिए। जिन इलाकों में मोमो की आदत नहीं, वहाँ बिक्री धीमी रहती है, यह पहले से समझ लेना चाहिए।
ला पिनोज़ पिज़्ज़ा 2011 में चंडीगढ़ से शुरू हुआ और अब देश भर में करीब 700 से ज़्यादा आउटलेट तक पहुँच चुका है। बड़ी विदेशी चेन के उलट यह ब्रांड आम निवेशक को सीधे फ्रेंचाइज़ी देता है। कुल लागत तकरीबन 20 लाख रुपये से शुरू होती है, इसमें फ्रेंचाइज़ फीस अलग गिनी जाती है, रॉयल्टी करीब 5 से 6 प्रतिशत बिक्री पर लगती है और जगह 350 से 750 वर्ग फुट चाहिए। डाइन इन, टेक अवे और डिलीवरी वाले फ़ॉर्मैट अलग अलग हैं।
पैसा वापस आने का समय डेढ़ से दो साल बताया जाता है, पर यह पूरी तरह लोकेशन और डिलीवरी ऑर्डर पर टिका है। कॉलेज और घनी रिहायशी बस्ती के पास मॉडल जमता है। जो पार्टनर किचन में रोज़ खड़ा नहीं हो सकता, उसके लिए यह काम मुश्किल है, क्योंकि मुनाफ़ा माल की बरबादी रोकने से बनता है।
चाय सुट्टा बार 2016 में इंदौर से शुरू हुआ और मिट्टी के कुल्हड़ में चाय देने की वजह से तेज़ी से फैला। अनुभव दुबे और आनंद नायक की यह चेन 550 से ज़्यादा आउटलेट और 320 से ज़्यादा शहरों तक पहुँच चुकी है, दुबई और ओमान में भी दुकानें हैं। फ्रेंचाइज़ी FOFO मॉडल पर मिलती है। फ्रेंचाइज़ फीस तकरीबन 6 से 12 लाख रुपये बताई जाती है और कुल लागत जगह के हिसाब से 10 से 20 लाख तक जाती है।
कॉलेज, कोचिंग और ऑफ़िस वाले इलाकों में यह मॉडल सबसे अच्छा चलता है, क्योंकि टिकट छोटा है और दिन भर आवाजाही रहती है। कुल्हड़, ताज़ा दूध और सफ़ाई का इंतज़ाम रोज़ का काम है। शांत रिहायशी गली में उतनी भीड़ नहीं मिलती, वहाँ हिसाब गड़बड़ा सकता है।
बेल्जियन वाफ़ल को मुंबई की ब्लूमबे एंटरप्राइज़ेज़ ने 2015 में शुरू किया था और डेज़र्ट कैटेगरी में यह देश की सबसे फैली चेन में है, आउटलेट करीब 450 के आसपास। खासियत अंडा रहित वाफ़ल और वाफ़ल सैंडविच है, जिसे चलते फिरते खाया जा सकता है। कियोस्क फ़ॉर्मैट के लिए बहुत कम जगह चाहिए, कुल लागत करीब 12 लाख रुपये से बताई जाती है, फ्रेंचाइज़ फीस तीन लाख के आसपास और रॉयल्टी तकरीबन 5 प्रतिशत।
मॉल, बाज़ार और सिनेमा के पास यह काम बढ़िया करता है, क्योंकि ग्राहक जल्दी आता है और जल्दी निकलता है। रसोई छोटी है, स्टाफ़ दो तीन लोगों से चल जाता है। शाम और छुट्टी के दिन बिक्री ऊपर जाती है, हफ़्ते के बीच के दिन सुस्त रहते हैं, इसलिए महीने का औसत देखकर हिसाब लगाना चाहिए।
किडज़ी ज़ी लर्न का प्री स्कूल ब्रांड है और भारत तथा नेपाल में इसके 1900 से ज़्यादा सेंटर हैं। पढ़ाई का अपना तरीका iLLUME नाम से चलता है, जिसमें बच्चे की उम्र के हिसाब से गतिविधियाँ तय होती हैं। फ्रेंचाइज़ी लेने वाले को तकरीबन 10 से 20 लाख रुपये लगाने पड़ते हैं, साथ में ग्राउंड फ़्लोर पर सुरक्षित जगह, खुला हिस्सा और 20 से 30 लोगों का स्टाफ़ चाहिए। कंपनी 80 से 90 घंटे की ट्रेनिंग, पाठ्यक्रम सामग्री और दाख़िले के लिए मार्केटिंग देती है।
यह धीमा और लंबा काम है: कमाई दाख़िले के मौसम पर चलती है और नाम बनने में दो तीन सेशन लग जाते हैं। रिहायशी कॉलोनी में अपनी या सस्ती किराए की जगह वालों को फ़ायदा होता है। जो जल्दी पैसा निकालना चाहते हैं, उनके लिए यह मॉडल नहीं है।
डीटीडीसी 1990 में बेंगलुरु में बनी और यही पहली कूरियर कंपनी थी जिसने भारत में फ्रेंचाइज़ी मॉडल खोला। आज इसके हज़ारों बुकिंग काउंटर बड़े शहरों से लेकर कस्बों तक फैले हैं। छोटे पार्टनर मॉडल में शुरुआत बहुत सस्ती है, फ्रेंचाइज़ फीस कुछ हज़ार से शुरू होकर शहर और मॉडल के हिसाब से बढ़ती है, कुल रकम आमतौर पर 50 हज़ार से कुछ लाख के बीच रहती है। कमाई बुकिंग पर कमीशन से आती है, कंपनी का हिस्सा कारोबार से कटता है।
यह काम उन लोगों को जमता है जिनके पास पहले से दुकान, स्टेशनरी या मोबाइल का काउंटर है और थोड़ी जगह खाली है। ऑनलाइन शॉपिंग की वापसी वाले पार्सल से रोज़ का काम मिलता रहता है। अकेले कूरियर से बड़ी कमाई नहीं होती, यह जोड़ने वाला धंधा है।
डॉ लाल पैथलैब्स देश की बड़ी डायग्नोस्टिक चेन है, जिसके पास सैकड़ों लैब और हज़ारों पेशेंट सर्विस सेंटर हैं। कंपनी दो तरह की साझेदारी देती है: छोटा कलेक्शन सेंटर और बड़ा डायग्नोस्टिक सेंटर। कलेक्शन सेंटर में निवेश करीब तीन से चार लाख रुपये बताया जाता है, इसमें फ़र्नीचर, सैंपल रखने का इंतज़ाम और साइन बोर्ड आता है। सैंपल कंपनी की लैब में जाँचे जाते हैं, रिपोर्ट उसी के सिस्टम से मिलती है, इसलिए भारी मशीन खरीदने की ज़रूरत नहीं।
यह मॉडल क्लिनिक, अस्पताल या दवा दुकान के पास जगह वालों के लिए सही है, क्योंकि मरीज़ वहीं से आता है। सैंपल समय पर भेजना और साफ़ रिकॉर्ड रखना सबसे ज़रूरी काम है। अकेली गली में सेंटर खोलने पर जाँच के ऑर्डर कम आते हैं, डॉक्टरों से रिश्ता बनाना पड़ता है।
पुणे से 2010 में शुरू हुआ फर्स्टक्राई आज शिशु सामान का सबसे बड़ा भारतीय ऑनलाइन बाजार है, और देश के छोटे शहरों तक इसके स्टोर पहुँच चुके हैं। नवजात के लिए यहाँ तैयार किट अलग खंड में मिलते हैं: सूती कपड़ों का सेट, स्वैडल, डायपर, स्किनकेयर और नहलाने का सामान एक हैम्पर में। दाम कुछ सौ रुपये से कई हजार तक, इसलिए तोहफे का बजट पहले तय कर लेना समझदारी है। क्लब सदस्यता पर क्लब कैश जमा होता है, जिसे अगली खरीद में लगाया जा सकता है।
जिन्हें एक ही जगह से डायपर, बोतल, कपड़े और खिलौने मंगाने हैं, उनके लिए यह सुविधाजनक है, खासकर कैश ऑन डिलीवरी और पैन इंडिया शिपिंग के कारण। पर यहाँ पक्का मासिक सब्सक्रिप्शन बॉक्स नहीं है, हर महीने ऑर्डर दोहराना पड़ता है। मंच पर कई विक्रेता हैं, तो सामग्री की सूची और साइज चार्ट खुद पढ़कर ही कार्ट में डालें।